स्वरचित कविता शीर्षक- "अब तोर का होही" वाह रे दहेज के लोभी, तहीं बता,अब तोर का होही। बेटा के बिहाव करें,अऊ मांगें हीरो होंडा। रंग रूप म ठिकाना नइय,चाल परे हे पोंडा।। जब चल देबे दुनिया लें,तब तोर पाप ल कोन धोही..... दाई ददा के खेत बेचागे,अऊ बेचागे दमड़ी। सोन चांदी देहे बर,घर बेचागे अऊ बेचागे पगड़ी।। एक दिन तोरो पारी आही,तब कोन तोर हाथ लमोही.... बेटी बनाके लाय रहेय,अऊ लगाय चार डंडा। का कसूर रहीच तेन तै, फांदें जुलुम के फंडा।। एक दिन फंदबे तै मुसुवा कस, तब कोन तोर बर रोही..... मारपीट के घर ले लिकाले,अऊ लगाये फंदा। होरा कस आगी म भुंजे,काम करें तै गंदा।। लेगही पुलिस हर एक दिन,अऊ कपड़ा कस निचोही.... रचनाकार दिलकेश मधुकर 10/03/2020 मो.नं.-9977234838