कोलकाता के एक इलाके में निर्धन तथा मरणासन्न लोगों के लिए निर्मल हृदय नामक एक निवास स्थान है। इसमें केवल ऐसे रोग ग्रस्त निर्धन लोगों को लिया जाता है जिनको कोई नहीं चाहता है। इन रोग ग्रस्त निर्धन लोगों के बिस्तर के पास बहुधा एक वृद्धा झुकी हुई, कोमल ह्रदया नारी दिखाई पड़ती थी, जो अपनी मुस्कान अथवा अपने स्पर्श से निराश्रय, भूखे लोगों को सांत्वना देती दिखाई देती थी। वह नारी मदर टेरेसा थी,जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन निर्धनतम व्यक्तियों के लिए समर्पित कर दिया था। अपने इस निवास-स्थान में वह केवल उन लोगों को ही लेती थी, जिनके लिए कहीं और ठौर नहीं होता था॥ अतः छोटे-मोटे बच्चे जिनकी देखभाल करने वाला कोई भी नहीं था या वृद्ध व्यक्ति जिन्हें कोई भी नहीं चाहता था, स्त्री-पुरुष जो इतने बीमार थे कि उनका ठीक होना संभव नहीं था, असहाय तथा भूखे भिखारी, इन सभी को मदर के पास आश्रय और सहारा मिलता था। वे सबकी एक समान देखभाल करती थी, चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म के हो। मदर टेरेसा उनके लिए एक मूर्तिमान सन्त थीं।

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