प्राचीन काल में मनुष्य छोटे-छोटे समूहों में रहता था। उस समय वह एक दूसरे के साथ रहने की कला ठीक से नहीं जानता था। वह आपस में लड़ता था और एक दूसरे को कष्ट पहुंचाता था। यह बात भी सही है कि वह आपस में प्रेम करता था, परंतु यह प्रेम केवल उसके समूह तक ही सीमित था। इस कारण प्रारंभ से ही मनुष्य का जीवन अशांत और दुखी रहा। वह सुख शांति चाहता था, पर यह नहीं जानता था कि उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? वह सोचता था कि दूसरों को दुखी बनाकर सुख प्राप्त किया जा सकता है। अपने सुख के लिए दूसरों को दुखी बनाने का परिणाम बहुत बुरा हुआ। मनुष्य के जीवन से सुख बिल्कुल समाप्त हो गया। महापुरुषों ने सदा से ही मनुष्यों के दुखों को दूर करने का प्रयास किया है। उन्होंने जो महत्वपूर्ण बात बताई वह यह है कि दूसरों के दुख को अपना दुख और सुख को अपना सुख मानो, तो सदा सुखी रहोगे।

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